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➧ शिक्षार्थियों की विशेषताएं :
अधिगमकर्ता या अध्येता :
⟹ अध्येता का अर्थ है : अध्ययन करने वाला||
⟹ अध्येता को शिक्षार्थी, विद्यार्थी या अधिगमकर्ता आदि नाम भी दिए गए हैं
⟹ अध्येता ही शिक्षण का केन्द्र बिंदु होता है।
⟹ शिक्षण की प्रारंभिक प्रक्रिया में अध्येता अपरिपक्व अवस्था में होता है, किंतु धीरे-धीरे वह सामाजिक एवं सांस्कृति गुणों के माध्यम से चारित्रिक गुणों को आत्मसात कर परिपक्वता की श्रेणी में आ जाता है। यह परिपक्वता शिक्षण के माध्यम से आती है।
किशोर और व्यसक अधिगमकर्ता :
⟹ किशोर अधिगमकर्ता - विकास की अवस्थाओं में 12 वर्ष से 18 वर्ष तक के आयु के बालक को किशोर अवस्था की श्रेणी में रखा जाता है।
⟹ व्यसक अधिगमकर्ता -18 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति या बालक को वयस्क (Adult) कहा जाता है।
⟹ इन दो आयु वर्ग के व्यक्तियों में सोच समझ आदि की प्रवृत्तियों में भिन्नता पाई जाती है। अतः शिक्षण के सम्बन्ध में इनमें शैक्षिक, सामाजिक, भावनात्मक, संज्ञानात्मक तथा व्यक्तिगत भिन्नताएँ हैं।
➧ किशोर अध्येता की प्रमुख विशेषताएं :
शैक्षिक Academic :
⟹ किशोर अवस्था में स्वयं परीक्षण, निरीक्षण. विचार और तर्क करने की प्रवृत्ति विकसित हो रही होती है।
⟹ इसलिए शिक्षण का स्वरूप भी मानसिक विकास, शारीरिक विकास, व्यक्तिगत भिन्नता के अनुरूप होना चाहिए जिससे किशोर अध्येता उसे अपनी समझ के अनुरूप आसानी से समझ सके |
सामाजिक Social :
⟹ किशोर अवस्था में बालक में जीवन दर्शन, नए अनुभवों की इच्छा, निराशा, असफलता आदि के कारण अपराध प्रवृत्ति का विकास होता है।
⟹ समाज सेवा की भावना का तीव्र विकास होता है।
⟹ वह स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना चाहता है। सामाजिक बुराइयों पर अपना तर्क देने लगते है।
⟹ अतः शिक्षण इस अवस्था किशोरों को सही मार्ग दिखाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
भावनात्मक Emotional :
⟹ किशोर अवस्था में भावनात्मक रूप से शिक्षार्थी किसी भी तथ्य को समझने में जल्दी करते हैं।
⟹ कल्पना, सत्य व असत्य और नैतिक और अनैतिक प्रश्न जानकर भी भावनात्मक प्रवृति के कारण उचित पथ प्रदर्शन के अभाव में गलत प्रवृतियों का शिकार भी हो जाते हैं।
⟹ अतः शिक्षण का प्रारूप सही मार्ग दर्शन वाला होना आवश्यक होना चाहिए।
संज्ञानात्मक Cognitive :
⟹ किशोर अवस्था में मस्तिष्क का लगभग सभी दिशाओं में विकास होता है।
⟹ वे कल्पना, नैतिक तथा अनैतिक के बारे में सजग हो जाते हैं।
⟹ अतः शिक्षण क्षेत्र में किशोर की संज्ञानात्मक प्रवृत्ति महत्वपूर्ण होती है।
➧ व्यस्क अध्येता की विशेषता :
शैक्षिक Academic :
⟹ वयस्क अध्येता में स्वयं परीक्षण, विचार तथा तर्क की प्रवृत्ति का उचित विकास हो चुका होता है।
⟹ जिम्मेदारी व सही दिशा के बारे में तर्क का ज्ञान विकसित होता है, जिससे अध्येता शिक्षण कार्य को अपनी कर्मनिष्ठा तथा उत्तरदायित्व की भावना से करने के प्रति संकल्पित होते हैं।
सामाजिक Social :
⟹ वयस्क व्यक्ति सामाजिक परिवेश में अच्छी तरह से समावेशित होता है, जिसमें वह सामाजिक रीति-रिवाजों, परम्पराओं आदि से बँधा होता है।
⟹ वह सामाजिक रीति-रिवाजों पर उचित विचार व तर्क भविष्य के प्रभावों को देखते हुए देता है। इसमें अपराध प्रवृत्ति पर अकुंश होता है।
⟹ इस प्रकार वयस्क अध्येता सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते हुए शिक्षण कार्य को निष्ठापूर्वक करने में योग्य होते हैं।
भावनात्मक Emotional :
⟹ वयस्क शिक्षार्थी भावनात्मक रूप से सही निर्णय लेने, किसी कार्य को करने के प्रति समर्थ होता है।
⟹ वह भावनात्मक रूप से निर्णय न लेकर उचित तर्क के माध्यम से विचारों व तथ्यों को रखता है।⟹ शिक्षण इनके भावनात्मक प्रवृत्ति के विकास को और मजबूती प्रदान करने में सहायक होता है।
संज्ञानात्मक Cognitive :
⟹ वयस्क शिक्षार्थी में मस्तिष्क का विकास लगभग पूर्ण हो गया होता है। वे कल्पना, मनोवैज्ञानिक, तथ्यहीन तर्कों के समाधान में सक्षम होता है।
⟹ यह उचित निर्णय लेने में सक्षम होता है।
⟹ इस प्रकार वयस्क अध्येता या शिक्षार्थी शिक्षण में भी संज्ञानात्मक निर्णय लेकर उचित निष्कर्ष प्रदान करता है।
⟹ अतः वह धार्मिक, नैतिक, सामाजिक आदि शिक्षाओं व सम्बन्धी प्रवृत्तियों को परखने में उचित मनोविज्ञान का प्रयोग करता है।
➧ शिक्षार्थी अधिगमकर्ता या अध्येता की विशेषताएँ :
⟹ अध्येता सदैव एक अर्थपूर्ण लक्ष्य द्वारा निर्देशित होता है।
⟹ अध्येता के अधिगम प्राप्ति का प्रेरणास्रोत स्वाभाविक रुचियाँ, अभिरुचियाँ एवं अभिवृत्तियाँ होती हैं, जो उन्हें किसी विषय या क्रियाओं को सीखने अथवा उदासीन रहने को उद्वेलित करता है।
⟹ अध्येता की महत्त्वाकांक्षा उसकी अधिगम प्रक्रिया की सफलता अथवा असफलता निर्भर करती है।
विद्यार्थी मूल प्रवर्तियाँ से संचालित होता है -
⟹ शिक्षा का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थी/अध्येता के आचार-विचार व व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना होता है। इन परिवर्तनों के मूल स्रोत मे मूल प्रवृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं।
⟹ प्रत्येक व्यक्ति में कुछ व्यवहार ऐसे होते हैं, जो जन्मजात होते हैं, जिन्हें सीखना नहीं पड़ता, इन्हें मूल-प्रवृत्तियाँ कहते हैं।
⟹ ये मूल प्रवृतियाँ आदत निर्माण, रूचि और रूझान जानने, ज्ञानार्जन, अनुशासन स्थापित करने, प्रेरणा देने में सहायक हैं।
विद्यार्थी संवेगात्मक रूप से प्रभावित होता है -
⟹ अधिगम की प्रक्रियाओं का संबंध सीधे संवेगों से होता है।
⟹ शिक्षण कार्य सफल माना जाता है, यदि विद्यार्थियों का बौद्विक विकास संवेगात्मक रूप से विचलित हुए बगैर हो। शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों में संवेगों का प्रशिक्षण किया जा सकता है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में सुख-दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, घृणा आदि का अनुभव करता है। इन अनुभवों से मन में जो भाव उत्पन्न होते हैं, उस भावों को मनोवैज्ञानिक भाषा में 'संवेग' कहते हैं।
⟹ मानव के सामाजिक व व्यक्तित्व विकास में संवेगों का योगदान होता है।
⟹ संवेग निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-
⟹ सुखद संवेग - स्नेह, हर्ष, प्रेम जैसे भाव मन में उत्पन्न होते हैं।
⟹ दुःखद संवेग- भय, घृणा, क्रोध, निराशा जैसे भाव मन में उत्पन्न होते हैं
विद्यार्थियों को स्थायी भाव से संचालित किया जा सकता है -
⟹ स्थायी भाव एक अर्जित संस्कार है। अर्जित संस्कार धीरे-धीरे व्यवस्थित होकर स्थायी भाव का रूप धारण कर लेते हैं, फलस्वरूप आचरण व व्यवहार नियत्रित होने लगते हैं।
⟹ शिक्षक और अभिभावक स्थायी भाव को विकसित करके विद्यार्थियों के नैतिक विकास में सहायता कर सकते हैं।
⟹ शिक्षक द्वारा आत्मसम्मान के स्थायी भाव को विकसित किया जाना चाहिये।
⟹ यह स्थायी भाव किसी भी विद्यार्थी या बच्चे के चरित्र निर्माण के लिये आवश्यक है
⟹ देश के महापुरूषों के जीवन चरित्र, देश का इतिहास व साहित्य का अध्ययन करना चाहिये।
⟹ इसके द्वारा विद्यार्थियों में देश-प्रेम का स्थायी भाव उत्पन्न होता है।
⟹ इसके द्वारा अच्छी आदतों का निर्माण होता है, जिनसे अनुशासन, आचार-विचार एवं व्यवहार को संतुलन बनाने में सहायता मिलती है।
➧ व्यक्तिगत भिन्नताएं :
⟹ कोई भी दो व्यक्ति बिल्कुल एक जैसे नहीं होते हैं। व्यक्ति विभिन्न पहलुओं में एक दूसरे से भिन्न होते हैं। वे शारीरिक रूप से और साथ ही मनोवैज्ञानिक रूप से भिन्न होते हैं। दो व्यक्तियों के बीच के अंतर को व्यक्तिगत भिन्नताएँ कहा जाता है।
⟹ व्यक्तिगत भिन्नताएँ क्षमता और योग्यताओं, अभिवृत्ति और प्रवृत्तियों, दृष्टिकोण और योग्यता, रुचियों और भावनाओं, स्वभाव और लक्षणों, आयु और लिंग आदि में अंतर के कारण होती हैं।
⟹ शिक्षार्थी अलग-अलग व्यक्तित्व होते हैं, उनकी अधिगम की शैली अलग-अलग होती है इसलिए एक शिक्षक के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह प्रभावी शिक्षण के लिए छात्रों की जरूरतों को पूर्ण करे।
⟹ शिक्षक निर्देश में अंतर करके इन भिन्नताओं को पूरा कर सकते हैं। विभेदीकरण का अर्थ छात्रों को पढ़ाने के लिए विभिन्न शिक्षण दृष्टिकोणों का उपयोग करना है।
⟹ सबसे अच्छी विधि विभिन्न प्रकार के अधिगम के अनुभव प्रदान करना है ताकि न केवल छात्र कक्षा में अवधारणाओं को सीख सकें, बल्कि अवधारणा के भौतिक अनुभव के साथ वे जो सीखते हैं, उसका संबंध भी बना सकें।
⟹ इस विधि को कई अन्तः क्रियात्मक अभ्यासों, भ्रमणों, क्षेत्र यात्राओं आदि के माध्यम से सुनिश्चित किया जा सकता है।
⟹ इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि यदि शिक्षार्थियों में व्यक्तिगत भिन्नताएँ हैं तो शिक्षक को विभिन्न प्रकार के अधिगम के अनुभव प्रदान करने चाहिए।
उदाहरण :
⟹ अधिगम की एक समान गति कुशल संचार सुनिश्चित नहीं कर सकती है क्योंकि प्रत्येक शिक्षार्थी की अधिगम की एक अनूठी गति होती है जिसे मानकीकृत गति से समकालीन बनाना और सामान्य करना बहुत मुश्किल होता है। ऐसी स्थिति में, यह स्पष्ट होगा कि कुछ छात्र समय की कमी के कारण पिछड़ जाएंगे, कुछ न्यूनतम उत्तीर्ण प्रदर्शन का प्रदर्शन करेंगे क्योंकि वे गति का सामना करने के लिए संघर्ष करेंगे, और कुछ उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं।
⟹ परीक्षाओं की बढ़ती संख्या समाधान नहीं है क्योंकि यह अंततः पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए कुल शैक्षणिक विवरण की उपलब्धता को कम करता है क्योंकि यह परीक्षाओं के लिए अधिक दिनों को अवरुद्ध करेगा और धीमी गति से सीखने वाले छात्रों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल होगा।
⟹ सख्त अनुशासन लागू करना उन छात्रों के लिए प्रभावी हो सकता है जो तेज दिमाग वाले हैं, और तेजी से सीखने वाले हैं, लेकिन उनमें रुचि नहीं है। यह उन छात्रों के लिए अच्छे परिणाम नहीं दे सकता है जो सीखने पर ध्यान केंद्रित करते हैं लेकिन गति का सामना करने में सक्षम नहीं हैं।





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